Wednesday, Apr 23, 2014

ज्योतिष विद्या एक विशाल समुन्द्र है संस्कृत में ज्योतिष का अभिप्राय उस प्रकाश से है। जो हमें ज्ञान देता है। अंग्रेजी भाषा में उसे आस्ट्रोलोजि कहते है। ''आस्ट्रो'' का अर्थ ''तारे'' और ''लोगोस'' का अर्थ ''तर्क'' होता है। अत: ज्योतिष विद्या का अर्थ है एक विशिष्ट समय तक राशि चक्र में ग्रहों और नक्षत्रों की गति का तर्क संगत प्रभाव ज्ञात करना (बारह भावों का फल)।

यह उचित कहा गया है कि वास्तु शास्त्रा कला एवं विज्ञान का सम्मिश्रण है। जिसमें रहस्यमयी या अलौकिक विज्ञान के अतिरिक्त शिल्प विद्या अभियान्त्रिकी अन्त: एवं वाह्य सञ्जाए पर्यावरण व अरगोंनोमिक्स, खगोलविद्या व ज्योतिष-शास्त्रा भी सम्मलित है। इसका मुख्य प्रयत्न मानव प्रकृति व भवनों में मानव जाति के उद्दार हेतु सन्तुलन व सामन्जस्य स्थापित करना है।

ज्योतिष के दो अंग है :- सिळान्त तथा फलित।

सिळान्त के अन्तर्गत विभिन्न दार्शनिक विचार या ज्योतिषशास्त्र के नियम आते है जबकि फलित के निम्नलिखित पाँच मुख्य भाग है। (1) जातक (2) ताजिक (3) मुहूत्र्त (4) प्रशान (5) संहिता।

मुहूत्र्त ज्योतिष के ही एक पक्ष के ''वास्तु के प्रकरण'' के नाम से जानते है।

सर्व प्रथम यह ज्ञान करने हेतु कि व्यक्ति विशेष के भाग्य में जमीन, मकान, भवन इत्यादि सम्पतियाँ हैं और यदि ऐसा है तो कब कहाँ और कैसे वह उनको प्राप्त करेगा। और वे कितने बड़े या छोटे होगें।

दूसरी बात यह ज्ञात करने हेतु कि प्लाट या भूमि खरीदने के लिये निर्माण प्रारम्भ करने के लिये मुख्य नीवं का पाया ज्ञात करना प्रवेश द्वार व दरवाजा निश्चित करने हेतु और अन्त में ''गृह-प्रवेश'' हेतु कार्यालय, कारखाना, छविग्रह, होटल, पाठशाला या महाविद्यालय इत्यादि के उद्घाटन हेतु कौन सा समय अत्यधिक शुभ है। ताकि मालिकों और निवासियों चाहे वे वहाँ रहे या कर्मचारियों के रुप में काम करें या यहाँ तक कि यात्रा, दृष्टा, विद्यार्थी या ग्राहक ही हो, हेतु सभी प्रकार की उन्नति, खुशहाली व शान्ति सुनिश्चित की जा सके।

हम किसी भी जातक की जन्मपत्राी से ज्ञात कर सकते है कि जातक के भू-सम्पदा का योग है तथा भवन-निमार्ण कर ''भवन-सुख'' है तो उस समय यह भी विचार करना चाहिये कि भवन हेतु भूमि कौन से नगर तथा नगर का कौन सा भाग अनुकूल है। क्यों कि प्रत्येक व्यक्ति के लिये नगर या मौहल्ला भवन-निर्माण हेतु उपयुक्त नहीं होता है तथा उपयुक्त दिशा का भी चयन कर लेना चाहिये। क्यों कि अनुकूल दिशा वाले भाग मे निर्मित भवन सभी प्रकार से शुभ सूचक होता है।

अब प्रश्न आता है कि भवन क्रय या निर्माण का कार्य किस नाम राशि से करना चाहिये। देश, ग्राम, गृह, युळ, नौकरी, व्यापार वमुकदमे में बोलते नाम राशि का प्रयोग करना चाहिये। जन्मराशि का प्रयोग यात्राा, ग्रह-गोचर एवं शुभ कार्यो मे करना चाहिये। किसी व्यक्ति के कई नाम हो तो पुकारने पर वह जिस नाम से सोता हुआ जाग जाय उसको प्रयोग मे लाना चाहिये।

व्यक्ति की नाम राशि से नगर या मौहल्ला की नाम राशि 2, 5, 9, 10 व 11 वीं हो तो शुभ। 1, 7 हो तो शत्रु। 4, 8 व 12 हो तो रोग। 3, 6 हो तो रोग कारक समझना चाहिये नगर शुभ न होतो जिस मौहल्ले में गृह निमार्ण करना हो वह शुभ होना चाहिये। यदि नगर व मौहल्ला शुभ होतो सर्वोत्तम है।

यदि व्यक्ति की नाम राशि से नगर या हमौहल्ले की नाम राशि 1, 3, 4, 6, 7, 8 व 12 वीं हो तो पहली राशि में होने पर इसका फल शत्रु, तीसरी राशि में होने पर हानि, चौथी राशि में होने पर रोग, छठी राशि में होने पर हानि, सातवीं राशि में होने पर शत्राु, आंठवी राशि में होने पर रोग और बारहवीं राशि में होने पर भी रोग होता है।

उक्त विचार करने पर यदि नगर व मौहल्ला शुभ एवं सर्वोत्तम है। तो यदि प्लाट पूर्व मुखी है तो श्रेष्ठ और यदि प्लाट के पूर्व व उत्तर में सड़क है तो सर्वश्रेष्ठ यदि उत्तरी मुखी है तो भी श्रेष्ठ, यदि पश्चिम मुखी है तो सामान्य और यदि दक्षिण मुखी है तो नेष्ठ होता है। जो अनेक समस्याओं और कष्ठ देने वाला होता है। प्लाट को क्रय करते समय शूल अथवा सड़क बीथी नहीं होनी चाहिये। क्यों कि सड़क-शूल दुर्घटना तथा अन्य बाधाओं का कारक होता है।

नगर व मौहल्ला शुभ व अशुभ देखने के लिये निम्न सारिणि है। जिससे आशानी पूर्वक देखा जा सकता है।

उक्त सारिणी से आसानी पूर्वक शहर या नगर या मौहल्ला का शुभ अशुभ का विचार करके यदि शुभ होतो भवन निर्माण करना चाहिये यदि अशुभ हो तो विचार नहीं करना चाहिये। यदि भाग्य से व्यक्ति को शुभ शहर, शुभ कालौनी (मौहल्ला) शुभ मुख का प्लाट मिलता हो तो व्यक्ति के अवश्य भवन बना कर रहना चाहिये, इससे व्यक्ति का चहुमुखी विकास होता है। और अपने जीवन का सभी प्रकार का आनन्द लेकर सुखमय जीवन व्यतीत करता है। व्यक्ति केा इसके विपरीत तथ्यों की ओर अग्रसर नहीं होना चाहिये। क्यों कि जीवन केा कष्टमय और संघर्ष पूर्ण बनाना औचित्य पूर्ण नहीं है।

नगर या मौहल्ला (कालौनी) चयन कर लेने के बाद यह निर्णय करना चाहिये कि उसका (नगर या मौहल्ला) किस दिशा का भाग अनुकूल है। यह भी नाम राशि से ज्ञात कर सकते है।

शुभाशुभ-दिशा ज्ञान चक्र

उक्त सारिणी के आधार पर अभिप्राय: यह है कि मेष राशि वाले उत्तर दिशा में, मिथुन, सिंह, व मकर राशि वाले मध्य भाग में कर्क राशि वाले नैऋत्य भाग में कन्या राशि वाले पूर्व भाग में, धनु राशि वाले पश्चिम भाग, कुम्भ राशि वाले ईशान भाग में और मीन राशि वाले केा अग्नि भाग में नहीं रहना चाहिये। इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओं में रहना चाहिये। क्यों कि वे दिशायें उनके लिये सुख-आराम के लिये शुभ एवं लाभप्रद रहेगी।

किसी भी जातक की जन्म पत्रिाका से उसके भवन के शुभ व अशुभ का ज्ञान हम कर सकते हे। लग्न पूर्व दिशा है जिसमें शुभ ग्रह का होना लाभप्रद होता है। द्वितीय भाव और तृतीय भाव ईशान कोण है जिनमें गुरु व चन्द्रमा का होना बहुत शुभ होता है। चतुर्थ भाव उत्तर दिशा है जिसमें शुभ ग्रहों का होना लाभ प्रद होता है। पं'चम व षष्ढ भाव वायव्य कोण है जिसमें योग कारक ग्रह अथवा केन्द्राधिपति का होना शुभ एवं लाभप्रद हैं सप्तम भाव पश्चिम दिशा है जिसमें पाप ग्रह व पाप राशि का होना अशुभ है। क्यों कि सप्तम भाव या सप्तमेश मारकेश होता है। अष्टम व नवम भाव नैऋत्य कोण है। जिसमें शनि होना शुभ है। क्यों कि अष्टम दुर्घटना व आयु तथा रहस्यमयी विद्याओं का स्थान है। अष्टमस्य शनि दीर्घ आयु प्रदान करता है। दशम भाव दक्षिण - दिशा है जिसमें योग कारक ग्रह अथवा केन्द्रपति व त्रिाकोणपति का बैढना शुभ होता है। एकादश भाव और द्वादश भाव अग्निकोण है। जिसमें ग्रहों का न होना अच्छा होता है। यदि उक्त दिशाओं में पाप ग्रह, नीच ग्रह या पाप ग्रहों की दृष्टियाँ होती है तो उस जातक के मकान मेें उस भाग में कोई न कोई दोष अज्ञानवश या परिस्थितिवश बन जाता है जिसके फलस्वरुप वह जीवन भर कष्ट पाता है। यदि किसी सुयोग्य वास्तुकार को मकान का अवलोकन करा दिया जाय तो उस दोष का निवारण हो सकता है। निवारण का योग उस जातक की शुभ ग्रह की दशा व अन्तर दशा तथा प्रत्यान्तर दशा में बनता है। इसलिये जातक को उस योग का लाभ, प्रयास करके प्राप्त कर लेना चाहिये अन्यथा पश्चाताप बना रहता है।

आचार्य जगदीश तिवारी