Wednesday, Jul 23, 2014

हस्त - रेखा

भक्ति योग :-

जिस मनुष्य के हाथ में दो आयु (हृदय) रेखाऐं हों और कर-पृष्ठ दीर्घ हो और पुष्ट हों तो वह मनुष्य भगवद् आराधना में लिप्त रहता है और भविष्य ज्ञाता होता है।

भविष्य-वक्ता योग :-

चन्द्र स्थान पुष्ट और छोटी-छोटी रेखाओं से कटा हो; चन्द्र और बुध क्षेत्र उन्नत हों तो मनुष्य भविष्य-वक्ता होता है।

त्रिकाल ज्ञान योग :-

ऊध्र्व रेखा (भाग्य रेखा) मणिवन्ध से उठकर मध्यमा के प्रथम पर्व तक जाए तो मनुष्य त्रिकालज्ञ होता है।

योगी योग :-

दीक्षा रेखा स्पष्ट रुप से अंकित हो, शनि और बृहस्पति क्षेत्र उन्नत हो, सूर्य रेखा शुद्ध होतो मनुष्य योगी होता है। शनि क्षेत्र पर त्रिकोण चिन्ह हो तो मनुष्य योगी होकर विशेष गौरव प्राप्त करता है।

श्रेष्ठ पद लाभ-योग :-

यदि कोई रेखा अनामिका के प्रथम पर्व से तीसरे पर्व तक जाए तो मनुष्य सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त करता है।

परकीय सम्पत्ति लाभ योग :-

हाथ में अपरा पितृ रेखा (जीवन रेखा) शोभती हो या सूूर्य क्षेत्रा उच्च हो( सूर्य रेखा और भाग्य रेखा अति शुद्ध हों तो मनुष्य दूसरे की सम्पत्ति प्राप्त करता है।

विद्या योग :-

बुध, बृहस्पति और सूर्य क्षेत्र उच्च हो औेर पितृ रेखा (जीवन रेखा) से ऊध्र्व गामिनी कोई रेखा वृहसपति क्षेत्र को जाए तो मनुष्य विद्या में पारंगत होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।

द्रव्य नाश योग :-

यदि शुक्र स्थान से छोटी-छोटी रेखाएं निकलकर पितृ रेखा और भाग्य रेखा को काटती हुई मंगल क्षेत्र (बुध क्षेत्र के नीचे) जाएं तो मनुष्य स्वत: अपने हाथों से अपने धन का नाश करता है।

विवाह में धन प्राप्ति योग :-

यदि वृहस्पति क्षेत्र पर नक्षत्र चिन्ह हो तो मनुष्य विवाह में बहुत धन प्राप्त कर सुख से जीवन व्यतीत करता है। यदि बुध क्षेत्र से परिणय (विवाह) रेखा सूर्य क्षेत्र में पहुंचे तो उत्तम कुल में विवाह होता है और विशेष धन प्राप्त करता है।

कष्टकर विवाह योग :-

यदि परिणय रेखा (विवाह रेखा) स्थूल और कुत्सित हो अथवा सरल स्वल्प रेखा द्वारा कटी हो तो वैवाहिक जीवन कष्ट कारी होता। सुन्दर कुशाग्र और दर्शनीय हो तो सुखप्रद विवाह होता है।

अनेक भार्या योग :-

शुक्र क्षेत्र में जाल चिन्ह हो तथा तर्जनी के तृतीय पर्व में नक्षत्र चिन्ह हो और परिणय रेखा के मुख पर दो-तीन खड़ी रेखाएं हों तो जातक का अनेक स्त्रिायों से संबंध होता है। (परिणय रेखा से जितनी रेखाएं  झुकी हों उतनी ही स्त्रिायों से विछोह होता है)।

विवाह विचार :-

परिणय रेखाओं में जितनी रेखाएं कुशाग्रए सुन्दर और समानान्तर बनी हों उतने ही विवाह होते हैं (या प्रेम सम्बन्ध होते हैं)। विवाह रेखा से कोई शाखा निकल कर आुय रेखा (हृदय रेखा) का स्पर्श करे विवाह होकर सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है। विवाह रेखा ऊपर अंगुली की तरफ झुकी हो तो जाकत अविवाहित रहता है। भाग्य रेखा से कई रेखाएं निकल कर आयु रेखा का स्पर्श करें तो भी विवाह नहींं होता।

बृहस्पति क्षेत्र के पास तर्जनी की बगल में नीचे जितनी सुन्दर रेखाएं एक दूसरे के समानान्तर दिखाई पड़ें उतने ही विवाह होते है (प्रेम सम्बन्ध होते है)।

दाम्पत्य जीवन :-

मातृ रेखा से कोई शाखा निकल कर या स्वतरू रेखा ही पितृ रेखा से मिले तो स्त्री पुरुष से प्रेम करती है। पितृ रेखा आकर मातृ रेखा से मिले तो पुरुष स्त्री से प्रेम करता है। दोनों मातृ-पितृ रेखा पृथक-पृथक हों तो दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं होता। दोनों रेखाएं परस्पर मिली हों देखने में सुन्दर हों तो दाम्पत्य जीवन सुखी होता है। विवाह रेखाआयु रेखा से जितनी निकट हो उतनी ही जल्दी विवाह होता हैं।

कारावास योग :-

शुक्र और मंगल क्षेत्रों में चतुष्कोण चिन्ह हों तथा हाथ की कोई अंगुली चार पर्वों से युक्त हों तो मनुष्य को कारावास मिलता है।

प्राणदण्ड योग :-

शनि क्षेत्र और मध्यमा के तृतीय पर्व में यदि दो नक्षत्र चिन्ह हों या मातृ रेखा शनि-स्थान में भग्न हो तो मनुष्य को प्राणदण्ड मिलता है।

आत्महत्या योग :-

भाग्य रेखा (ऊध्र्व रेखा) के प्रारम्भ में और चन्द्र क्षेत्र में भी नक्षत्र चिन्ह हो और मंगल के स्थान (बुध क्षेत्र के नीचे) के क्रास या जाल चिन्ह हो तो मनुष्य आत्महत्या योग करते हैं।

अकाल मृत्यु योग :-

भाग्य रेखा के पास तथा आयु (हृदय) रेखा और मातृ (शीर्ष) रेखा के बीच में गुणक (क्रास) का चिन्ह हो या रेखा भग्न हो या छोटी-छोटी रेखाओं से कटी हो तो मनुष्य की असामयिक मृत्यु होती है।

अल्पायु योग :-

भाग्य रेखा मातृ रेखा को न काट कर शनि को पहुंचे तो मनुष्य अल्प आयु वाला होता है।

तीर्थ स्थान में मृत्यु :-

चन्द्र क्षेत्रा और बृहस्पति क्षेत्रा उन्नत हों तथा शनि क्षेत्रा पर पद्म (कमल) का चिन्ह हो तो मनुष्य की मृत्यु तीर्थ स्थान में होती हैं।

दीर्घायु योग :-

हाथ की अंगुलिया लम्बी हों, आयु (हृदय) रेखा बुध स्थान से बृहस्पति क्षेत्र तक स्पष्ट और अखण्ड हो तो मनुष्य दीर्घायु होता है।

पितृ (जीवन) रेखा लम्बी; स्पष्ट, वक्र नीचे की ओर झुकी तथा अछिन्न हो तो भी दीर्घायु योग होता है।

मध्यायु योग :-

हाथ की अंगुलियां मध्यम हों तथा आयु रेखा शनि क्षेत्र तक निर्दोष होकर जाए तो जातक मध्यायु वाला होता है।

अल्पायु योग :-

अंगुलियां छोटी हों, कृश और वक्र हों आयु रेखा अनामिका के मूल तक जाए और छिन्न-भिन्न होए पितृ रेखा पतली या चौडी, म्लान, भद्दी तथा खण्डित हो, मातृ रेखा शनि स्थान तक जाए और शाखाहीन हो, तो अल्पायु योग होता है।

इस संबंध में 'हस्त संजीवनी' का मत :-

यदि आयु (हृदय) रेखा में (1) रक्त नील मिश्रित बिन्दु; (2) केवल रक्त बिन्दु (3) श्वेत बिन्दु या (4) श्याम बिन्दु हों तो मनुष्य को क्रमश: सर्पदशन, रक्त रोग, सन्निपात, विषपान का भय होता है।

यदि आयु रेखा श्याम वर्ण हो और उसमें रक्त बिन्दु हो तो मनुष्य को बिजली के द्वारा भय होता है।

यदि रेखा किसी सीधी रेखा से कटी हो तो शस्त्र के द्वारा चोट खाने से मृत्यु का भय होता है। यदि कोई रेखा बुध क्षेत्र से अंकुश के समान नीचे होकर आयु रेखा को काटे तो हाथी के द्वारा चोट खाने का भय होता है। यदि आयु रेखा के अन्त में अनेक रेखाएं हों तो घोड़ें के द्वारा भय होता है।

यदि दाहिनी ओर से अनेक टेढ़ी रेखाएं आयु (हृदय) रेखा को काटें तो जलकर मृत्यु होने की आशंका होती है। यदि बायीं ओर से ऐसी रेखाएं आयु रेखा को काटें तो जल में डूबकर मृत्यु होने की संभावना होती है।

यदि आयु रेखा अन्य रेखाओं के अनेक स्थानों पर कटी हो तो स्त्री द्वारा कंक प्राप्त होता है और अल्पमृत्यु होती है। यदि आयु रेखा से कोई रेखा नीचे की ओर झुकी हो तो उच्च स्थान से गिरकर मृत्यु होने की संभावना होती है। यदि आयु रेखा मोटी, देखने में भद्दी और श्यामवर्ण हो तो मनुष्य को परिवार सम्बन्धी चिन्ता होती है। उसका मन चंचलतथा उद्र्वगयुक्त होता है।

बाल्यावस्था में माता-पिता की मृत्यु :-

यदि भाग्य रेखा के आरम्भ में यव (द्वीप) या त्रिाकोण चिन्ह हो तो जातक अपनी बाल्यावस्था में अपने माता-पिता को खो बैठता है।

पुरुष व्यभिचार योग :-

यदि शुक्र क्षेत्रा में जाल चिन्ह तथा तर्जनी और मध्यमा में क्रम से नक्षत्र और त्रिकोण चिन्ह हो तो मनुष्य व्यभिचारी होता है।

धर्म-परिर्वतन योग :-

भाग्य रेखा से निकल कर कोई रेखा मणिबन्ध की ओर जाए और सूर्य क्षेत्र में गुणक (क्रास) चिन्ह हो; तो मनुष्य अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म ग्रहणकर लेता है।

भाग्योदय :-

यदि मणिबन्ध वलय के ऊपर गुणक चिन्ह हो तथा ऊध्र्व (भाग्य) रेखा पुष्ट होए तो मनुष्य अत्यन्त सौभाग्यशाली होता है।

जल-मग्न योग :-

यदि सब अंगुलियों के तीसरे पर्व में यव चिन्ह हों तो मनुष्य दुराचारी होता है और जल में डूबकर उसकी मृत्यु होती है।

सम्पत्ति और सुख :-

यदि आयु (हृदय) रेखा बृहस्पति क्षेत्र तक जाए और उसकी एक शाखा शनि क्षेत्र को जाए तो मनुष्य शत्रुओं को पराजित करके सम्पत्तिशाली बनता है और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।

आचार्य जगदीश तिवारी