ज्योषित-शास्त्र में ‘‘प्रभुकृपा’’

मानव पूर्व जन्म के संचित फलों के आधार पर चौरासि लाख योनियों को पार करके मनुष्य योनी में जन्म लेता है। यह योनी उसके सत् कर्म और प्रभु-कृपा से प्राप्त होती है। मनुष्य के जीवन में सुख और दुखरू उसके पूर्व जन्म कालिक होते है, यदि पूर्व जन्म के सत् कर्म अधिक है और तात्कालिक कर्म प्रभू के द्वारा प्रद्त्त बुद्धि विवेक से सत् कर्म और करता है। तो जीवन में लम्बे समय तक सुखरू भोगता है। यह सुखरू प्रभु-कृपा मानकर उनका उपभोग करता है और प्रभु के गुणगान करता हुआ इस जन्म चक्र के जाल से मोक्ष को प्राप्त कर जाता है। और यदि पूर्व जन्म के पाप कर्म अधिक होते है। और बुद्धि विवेक की हीनता से तात्कालिक कर्म पाप ही और करता है। तो प्रभु को दोष देता हुआ लम्बे समय तक कष्ट भोगता है। और मोक्ष प्राप्ति के अभाव में अधोगति को प्राप्त होता है। यह भी प्रभु-कृपा ही कही जाती है।

सांसारिक प्राणियों में मानव सबसे अधिक बुद्धि जीव है। और वह प्रभु के द्वारा निर्मित विभिन्न आयामों की खोज करता है और अन्य प्राणियों को लाभान्वित करता है। यह कार्य हमारे सभी ऋषि-मुनियों और तपस्वीयों ने भी किया। उनके अनुसार ईश्वर एक ऐसी अलौकिक शक्ति है जिसे अनुभूत किया जा सकता हैए अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। यह शक्ति सर्व व्यापक है। इस शक्ति के द्वारा ही संसार चक्र संचालित है। जिस प्रकार हम हवा को देख नहीं सकते है। केवल उसे अनुभूत करके अभिव्यक्त कर सकते हैं। उसी प्रकार इस अलौकिक शक्ति को अनुभूत तो किया जा सकता हैं लेकिन अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। इस तथ्य को हमारे मुनियों ने इस प्रकार से भी समझाया  है। जिस प्रकार गूंगा व्यक्ति किसी भी प्रकार के फल को खाकर उसके रस की रसानभूति तो कर सकता है, लेकिन उस रसानभूति को अभिव्यक्त नहीं कर सकता हैं।

(पाणिनीय-शिक्षा 41) के अनुसर ''ज्योतिषामयनंयक्षुरू'' ज्योतिष शास्त्र ही सनातन वेद का नैत्रा है। इस वाक्य से प्रेरित होकर '' प्रभु-कृपा '' भगवत-प्राप्ति भी ज्योतिष के योगो द्वारा ही प्राप्त होती है। ऐसा तर्क हुआ और शोध कार्य में संलग्न हुआ। ज्योतिष के कई पुराने नये ग्रंथों का अध्ययन किया। कुछ ही समय में कुछ तथ्यों का संग्रह कर लिया। जिसको में प्रभु की कृपा ही मानता हूं। तुलसीदासजी ने मानस मे लिखा है।

जोग - लगन ग्रह वार तिथिए सकल भये अनुकूल।
चर - अरु अचर हर्ष - युतए राम जनम सुखमूल।।

इस कथनानुसार ज्योतिष का ही प्रभाव हर क्षेत्रा में प्रधानता रखता है। अतरू मैं प्रभु-कृपा ज्योतिष के किन-किन योगों से सम्भव है। प्रस्तुत कर रहा हूं रू- जन्म कुण्डली में द्वादश भाव (घर) होते है। प्रत्येक भाव 'मानव जीवन के सर्व प्रकार की आवश्यकताओं के कारक होते है' उन कारकों को ग्रह प्रदान करते हैं। ग्रहों के द्वारा जो भावेश तथा कारक होते है उनकी स्थिति अनुसार फल प्राप्त होते हैं। अतरू प्रभु-कृपाए ईश्वर-प्राप्ती, धर्म-कर्म, देव-शक्ति, आदि 'नवम-भाव' तथा इस भाव के कारक 'गुरु' ग्रह है। इनकी स्थिति अनुसार प्रभु कृपा प्राप्त होती है।

प्रभु-कृपा और भावेश:- कुण्डली के दशम भाव के स्वामीए बुध हों। और उस पर शुभ-ग्रहों की दृष्टि हो तो प्रभु-कृपा होती है। (2) नवम के स्वामी उच्चस्थ हों उन पर शुभ ग्रह की (चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र) की दृष्टि हो तो प्रभु कृपा होती है। (3) नवमेश पूर्ण :- बली हो उन पर गुरु की शुभ दृष्टि हो तोए ईश्वर कृपा होती है। (4) लग्नेश पर या लग्न पर नवमेश की दृष्टि हो तो प्रभु-कृपा कारक है। (5) नवमेश गुरु के साथ होए और षड्वर्ग में बली हो या लग्नेश पर गुरु की पूर्ण दृष्टि हो। (6) नवमेश सिंह के अंश का हो। उन पर लग्नेश अथवा दशमेश की दृष्टि भी हो। (7) दशमेश केन्द्र में हो (1-4-7-10) नवमेश चोथे हो तो ऐसे जातक प्रभु-कृपा से अपने जीवन को सार्थक-सुखी सम्पन्न बनाये रखते है चतुर्दीक यश पताका फहराती है।

यह योग जो दर्शाये गये हैं। 'स्थूल' हैं। अध्ययन करते समय सूक्ष्म रुपों का भी ध्यान रखना आवश्यक है। उनकी अंशात्मक स्थिति नवांश-सप्तांश आदि। तथा जिस जातक की कुण्डली का अध्ययन किया जावे उसकी सामाजिकताए धार्मिकताए व्यवसाय जीविका का भी अध्ययन करना आवश्यक हैं क्योंकि प्रभु-कृपा के कई स्वरुप है। मनुष्य की आवश्यकताओं आकांक्षाओं पर भी प्रभु-कृपा निर्भर है। अतरू हर पहलू का विचार कर फलादेश किया जाना चाहिये। हर विषय के दो पहलु होते हैं। सिद्धांतिक और व्यवहारिक दृष्य-अदृप्य। जैसे :- सूर्य ग्रह नहीं है पर व्यवहार में उसे ग्रह मानते हैं चलित माना जाता है। जबकि वह स्थिर है। जबकि ग्रह पृथ्वी है। चूकिं हम पृथ्वी वासी है हमारे लिए सूर्य दृश्य है अतरू पृथ्वी के स्थान पर 'सूर्य' रखकर अध्ययन करते है। साथ ही सभी योग-समय परिवर्तित भी हैं। और अशुभ योग इसका अध्ययन ग्रहों की दशा चक्र के अनुसार होता रहता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि सभी बातों का ध्यान रखते हुए हर विषय का अध्ययन करना चाहिए तो ही सही निष्कर्ष पर पहुंच सकते है। मनुष्य भिन्न-भिन्न प्रकार के स्थिति वाले होते है। अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार प्रभु-कृपा का अनुभव करते है। एक भूखा व्यक्ति है उसको यदि समय पर कैसा भी भोजन मिल जाये वह प्रभु-कृपा मानता है। एक पुत्र प्राप्ति का इच्छुक है यदि उसे पुत्र प्राप्ति हो जाती है तो वह प्रभुकृपा मानता है। पर यह निश्चय है कि बिना प्रभुकृपा के कुछ भी नहीं होता है सभी महापुरुषों-संतों ने इस तथ्य केा बार-बार दोहराया है।

आचार्य जगदीश तिवारी