Wednesday, Jul 30, 2014

ज्योतिष के आईने में कर्म

भारतीय-दर्शन के अनुसार आत्मा अमर है। इसका कभी नाश नहीं होता है। कर्मो के अनादि-प्रवाह के कारण यह विभिन्न योनियों को धारण करता रहता है। अनके जन्मों के सञ्चित कर्म-फलों को एक साथ भोगना सम्भव नहीं होता है। अत: उन्हें एक-एक करके भोगना पडता है। इसी कारण जीव को बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र में भ्रमण करते हुए विभिन्न योनियॉ धारण करनी पडती है। यदि सञ्चित कर्मो का भोग समाप्त हो जाय तथा क्रियमाण-कर्म शुभ हों तो आत्मा आवागमन के चक्कर से छूटकर मुक्त हो जाती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ज्ञानरुपी अग्नि सञ्चित कर्मो को नष्ट कर देती है। ज्ञानाग्नि को प्रज्वति करने के अनेक उपाय बताये गये है। ज्योतिष-शास्त्र भी उनमें से एक है।

कर्म तीन प्रकार के बताये गये हैं :- 1) संचित,  2)प्ररब्ध तथा  3) क्रियमाण। अनेक जन्मों के पाप-पुण्यों द्वारा अर्जित कर्म संञ्चित कहलाते हैं। सिञ्चत कर्मो में से जितने कर्मो का फल वत्र्तमान शरीर भोगना आरम्भ कर देता हैं। उन्हें प्रारब्ध कहा जाता है तथा वर्तमान शरीर द्वारा होन वाले पाप-पुण्यात्मक कर्मो को क्रियमाण कहते हैं।

सञ्चित-कर्मो में से जितने कर्मो का फल वत्र्तमान शरीर भोगना आरम्भ कर देता है। उसे प्रारब्ध अथवा भाग्य कहते हैं। प्रारब्ध-कर्म अर्थात भाग्य द्वारा प्राप्त सुख-दुख प्राणी को भोगने ही पडते है। परन्तु जिस प्रकार निदान तथा औषध-प्रयोग द्वारा किसी रोग से शीघ्र छुटकारा पा लिया जाता है। उसी प्रकार ज्योतिष के आधार पर प्रारब्ध के सम्बन्ध मे जानकारी प्राप्त करके तप, दान, पुण्य, शुभ-कर्म आदि क्रियामाण-कर्मो के औषध रुपी उपायों के द्वारा उसके दुष्प्रभाव से शीघ्र मुक्ति पायी जा सकती है।

क्रियमाण-कर्म पूर्णत: परिवत्र्तनशील होते है। ज्ञान तथा पुरुषार्थ के बल पर उनमें आमूल-चूल परिवत्र्तन किया जा सकता है।

कर्म के दो मुख्य भेद 1) दृढ़ मूल तथा 2) शिथिल मूल भी कहे गये है। द्ढ मूल अर्थात गहरी जढ़ों वाले कर्मो द्वारा निर्मित प्रारब्ध अर्थात भाग्य में कोई बड़ा परिवत्र्तन नहीं लाया जा सकता, तथापि पुरुषार्थ द्वारा उसके अशुभफल को कुछ कम किया जा सकता है। शिथिल मूल अर्थात कम गहरी जडों वाले कर्मो द्वारा निर्मित प्रारब्ध को क्रियमाण शुभ कर्मो द्वारा बदला भी जा सकता हैं। इसके अतिरिक्त विद्यमान जन्म के शुभ कर्म रुपी  पुरुषार्थ द्वारा अगले जन्म के श्रेष्ठ प्रारब्ध का निर्माण भी किया जा सकता है।

ज्येातिष-शास्त्र के उपयोग का सबसे बडा लाभ प्रारब्ध अर्थात सञ्चित कर्मो का ज्ञान प्राप्त होना है। उसे जानकर पुरुषार्थ द्वारा वाञ्छित-परिवत्र्तन लाने का उद्योग किया जा सकता है। यथा - किसी शुभ-ग्रह की दशा, शुभ-मुहूत्र्त अथवा शुभ-शकुन में आरम्भ कियं गये किसी कार्य अथवा यात्राा में शुभ फल प्राप्त होने की अधिक सम्भावना रहेगी, इसके विपरीत हानि होना भी सम्भव है। अत: इसकी उपयोगिता को स्वीकार कर, प्रत्येक मनुष्य को ज्योतिष-शास्त्रा द्वारा अधिकाधिक लाभन्वित होने की चेष्टा करनी चाहिए। इस शास्त्रा के आधार पर बुळिमान मनुष्य अपने पुरुषार्थ द्वारा 'दैव' (प्रारब्ध अथवा भाग्य) को भी नीचा दिखाने में समर्थ हो सकता है। यही इसका सबसे बडा लाभ है।

वैदिक ज्योतिषशास्त्र भ्रम में फंसे, दबे हुए, कमजोर एवं निस्सार व्यक्तियों को निडर बनने की प्ररेणा देता है। वेदों की शिक्षा है ' निडर बनों। हमारे सभी देवी-देवता अभय होने का  आशीर्वाद देते हुए, अभय मुद्रा में दिखाई देते हैं। उपनिषदों की शिक्षा है, '' डरपोक लोग मोक्ष के अधिकारी नहीं बन सकते। हम मृत्यु से डरते हैं, हम अपने दुर्भाग्य से डरते हैं। हम किसी अनजान बस्तु से भी डरते हैं; इस प्रकार हम सभी चीजों से डरते हैं, सदैव डरे हुए रहते हैं। कर्म सिळांत प्रत्यक्ष रुप से यह विश्वास दिलाता है कि यह संसार-चक्र ईश्वर के द्वारा बिल्कुल ठीक तरीके से, बहुत सोच-विचार के बाद बनाया गया है। इसके बाद हम यह अनुभव करने लगते हैं कि यह सारा संसार ईश्वर द्वारा बहुत योजनाबद्ध रुप से बुळिमत्तापूर्ण ढंग से रचा गया है। हम उस परमशक्ति परमात्मा के द्वारा चलाए जा रहे नाटक में एक पात्रा की भांति उसी की इच्छा के अनुसार कार्य कर रहे हैं।

कर्म-सिळांत के तीन स्तम्भ हैं; जो इस प्रकार हैं -

(1) पुनर्जन्म

(2) मनुष्य कर्म करने से बच नहीं सकता। यह सम्भव ही नहीं है कि कोई मनुष्य कर्म न करे।

(3) अपने कर्मों का फल (अच्छा या बुरा) अवश्य मिलता है। केव इसी प्रकार से कर्म-चक्र चता रहता है एवं उसका परिणाम मिलता रहता है। स्मृति में कहा गया है-

अवश्यमनु भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम।
त भुक्तं क्षीयते कर्म कल्प कोटि शतैरपि।।

''प्रत्येक मनुष्य अपने कर्मों का अच्छा या बुरा फल अवश्य भोगता है? किसी भी परिस्थिति मे अच्छा या बुरा फल कम अथवा अधिक नहीं हो सकता।''

उपर्युक्त तीनों स्तम्भ बहुत संक्षेप में, पर स्पष्ट रुप से मनुष्यों को किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए, तथा किसी भी प्रकार के डर को निकाल-फेंककर मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी बना देते हैं। सारा ज्योतिषशास्त्र पुनर्जन्म के सिळांत पर आधारित है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार किसी व्यक्ति की कुण्डली देखकर उसके भूतकाल के बारे में बताया जा सकता है, और भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है। ऐसा किसी व्यक्ति के कर्मों की गति को देखकर बताया जाता है। यह कर्मों की गति बडी चतुरता से प्रत्येक कुण्डली में दिखाई दे जाती है। इसी प्रकार कुण्डली से यह पता लगता है कि उस व्यक्ति की महादशा मे किस ग्रह की दशा चल रही है, वह ग्रह किस राशि मे विचरण कर रहा हैं, उसमें कितना समय भोग चुका है और जन्म के बाद से उस राशि के विचरण में उसे कितना समय और भोगना बाकी है। इस प्रकार ग्रहों और राशियों के भ्रमण से यह भी पता चल जाता है कि यह व्यक्ति अपने जीवन के उन्नति के शिखर पर कब, कहां तक पहुंचेगा।

हम सब इस ब्रह्मांड के प्रतिरुपक हैं। यह ब्रह्मांड पंचतत्व अर्थात अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु और आकाश से मिलकर बना है। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य का शरीर भी इन्हीं पांच तत्त्वों से मिलकर बना है। इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर ने हमारा ढांचा, स्वरुप ऐसा बनाया है, ताकि हम अपना योगदान उसके अनुकूल कर सकें। प्रत्येक मानव की अपनी इच्छाएं होती हैं, और वह उन्हें पूरा करने का प्रयत्न करता है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति के विचार, इच्छाएं अलग-अलग होती हैं और प्रत्येक बस्तु या घटना के प्रति हमारी प्रतिक्रिया भी अलग-अलग होती हैं यह हमारे कार्मिक ढांचे का बाहरी रुप है जो हमारी आन्तरिक प्रवृत्तियों को भी दर्शाती है। इसी प्रकार कर्म करके हम अपने पिछले कर्मों का फल प्राप्त करते हैं और मोक्ष प्राप्त की ओर अग्रसर होते है। प्रत्येक कुण्डली को हम चार भागों में बांटते हैं :-

 

1) धर्म
2) अर्थ
3) काम
4) मोक्ष

प्रत्येक कुण्डली में पहला, पांचवा और नवां स्थान धर्म का होता है? दूसरा छठा और दसवां अर्थ का; तीसरा, सातवां और ग्यारवां स्थान काम का? और चौथा, आठवां एवं वारहवां स्थान मोक्ष का होता है। इन स्थानों पर जो ग्रह तथा नक्षत्रा बैठे होंगे, वे उस व्यक्ति के कर्मों की गति स्पष्ट करते है। यदि किसी व्यक्ति के अधिकतर ग्रह व नक्षत्रा अर्थ व काम स्थानों में बैठे हैं जो उस व्यक्ति की इच्छाएं व प्रवृत्ति उसी तरफ अधिक होगी; और उसकी इच्छाएं व अर्थ रुपए-पैसे संबंधी कार्य उसी समय पूरे होंगे जबकि उस कुण्डली से उस व्यक्ति की प्रवृत्ति व उस प्रवृत्ति के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है, यह पता चल जाता है। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति धर्म व मोक्ष प्राप्ति चाहता है, तो उसकी कुण्डली के अच्छे ग्रह धर्म व मोक्ष वाले स्थानों पर अवश्य बैठे होंगे। इसके अतिरिक्त और भी अन्य प्रकार से ग्रहों की स्थिति हो सकती है, अत: हम देखते हैं कि मनुष्यों के विचार, प्रवृत्ति अलग-अलग होते हैं।

संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि कर्म हमारे जीवन के अंग है। सभी कर्मो के फल प्राप्त होते हैं। यह फल प्राप्त करने का सिळांत सारे ब्रह्मांड में व्याप्त कारण और उसका असर वाले सिळांत पर आधारित होता है। वैदिक ज्योतिशास्त्र में यह कारण और उसका असर वाला सिळांत केव स्थूल से ही नहीं बल्कि उससे ऊपर उठकर कार्य करता है। स्थूल रुप से प्रत्येक कारण का असर उसकी प्रतिक्रिया तत्काल उत्पन्न होती है। ज्योतिष शास्त्रा में  प्रतिक्रिया तत्काल भी हो सकती है। अथवा कुछ समय बाद भी; तथा प्रत्येक कार्य की क्या प्रतिक्रिया होगी यह भी परमात्मा पर उसकी इच्छा पर निर्भर होता है।

कर्म का सिळांत मानव जीवन में तभी ठीक तरह से लागू होता हे, जब हम यह समझें कि मानव जीवन के स्थूल शरीर में उसकी अन्तर्आत्मा भी निवास करती है। अत: इस अन्त:करण की प्रतिक्रिया भी शारीरिक प्रतिक्रिया से जुड़ी होती है, और अन्तत: यहां पर दैवीय इच्छा शक्ति काम करती है जो प्रत्येक मानव के जीवन में रहन-सहन, क्रमानुसार विकास एवं गति पर अपनी छाप बनाए रखती है।

आचार्य जगदीश तिवारी